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वैश्विक भूख में बढ़ोत्तरी, भारत में 23% आबादी प्रभावित: UN

hunger

एक दशक से अधिक समय तक निरंतर गिरावट के बाद वैश्विक भूख एक बार फिर से बढ़ रही है, जिस कारण वर्ष 2016 में 81.5 करोड़ (वैश्विक आबादी का 11 प्रतिशत) लोग प्रभावित हुए। 2015 में यह संख्या 777 करोड़ थी। हालांकि साल 2000 में 900 करोड़ की तुलना में यह काफी नीचे है।

रोम स्थित संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसियों ने यह जानकारी दी। विश्व खाद्य सुरक्षा और पोषण पर संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक रिपोर्ट के एक नए संस्करण में खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ), कृषि विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय निधि (आईएफएडी) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) समेत अन्य संगठनों ने यह चेतावनी दी है।

एजेंसियों ने कहा, ‘कुपोषण के कई रूप दुनियाभर में लाखों लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बने हुए हैं।’ विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 3.8 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण हिंसक संघर्ष और जलवायु संबंधी झटके हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पांच वर्ष से कम उम्र के 15.5 करोड़ बच्चे अविकसित हैं, जबकि 5.2 बच्चे लगातार कमजोर हो रहे हैं, मतलब उनका वजन उनकी लंबाई के हिसाब से बहुत कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमान के अनुसार, 4.10 करोड़ बच्चे अब अधिक वजन वाले हैं और महिलाओं में एनीमिया एवं वयस्कों में मोटापा भी चिंता का कारण है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘ये प्रवृत्तियां न केवल संघर्ष और जलवायु परिवर्तन, बल्कि आहार की आदतों में भी भारी बदलाव के साथ-साथ आर्थिक मंदी का भी परिणाम है।’

आंकड़े बताते हैं कि भारत में ऐसे लोगों की कुल आबादी 19.07 करोड़ है जो कुल आबादी के मुकाबले 14.5 फीसदी है। डेटा के अनुसार भारत में 5 साल के नीचे के 38.4 फीसदी बच्चे अविकसित हैं। जबकि प्रजनन उम्र की 51.4 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकायत से जूझ रहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार पोषण संबंधी अभाव मानसिक विकास, स्कूल प्रदर्शन और बौद्धिक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

चीन और श्रीलंका की तुलना में भारत में बच्चों की अविकसित दर ज्यादा है। श्रीलंका में 14.7 फीसदी और चीन में 9.4 फीसदी बच्चे अविकसित हैं। आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण के कारण पैदा होने वाले छोटे कद के बच्चों की संख्या 2005 के 6.2 करोड़ के मुकाबले घटकर 2015 में 4.75 करोड़ हो गई। वहीं वजनी व्यस्कों की संख्या 2014 के 1.46 करोड़ से बढ़कर 2.98 करोड़ हो गई।

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