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मिलिए इस शख्‍स से जिनके एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में है गीता

January 22, 2018 , प्रीतम कपूर

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बस्ती। गंगा-जमुनी तहजीब की मिशाल कायम करते हुए बस्‍ती जिले के बदीउज्‍जमा एक ऐसे इंसान है, जिन्‍हें लोग धर्मों का संगम मानते हैं। इनका धर्म तो ईस्लाम है, मगर उनका कर्म हिन्दू धर्म है। कुरान की आयतों की सच्ची समझ के साथ गीता से प्रेरणा लेकर जीवन जीना इनकी अपनी कला है। 80 के दशक के विधि स्नातक बदीउज्‍जमा सांप्रदायिक भाईचारे की मिशाल हैं।

स्वतंत्रता के बाद से आरक्षण की पेचीदगियों के पूर्व तक गांव की सरपंची व प्रधानी इनके परिवार में रहना ही इनकी लोकप्रियता की कहानी कहता है। गांव की प्रधानी कभी पिता, तो कभी पत्नी और कभी स्वयं भी इस पद के दायित्व का निर्वहन कर चुके हैं। दुबौलिया विकास खंड के मुस्लिम बाहुल्य गांव बैरागल के रहने वाले बदीउज्जमा के पिता का नाम शेख मुहम्मद इद्रीस है।

बदीउज्‍जमा, धर्म के नाम पर दिलों में दूरी पैदा करने वालों के लिए नजीर हैं। नाम से ही सोच सीमित करने के समाज के नजरिए के चलते इन्होंने अपने बेटे का नाम पंकज तथा बेटी का नाम पलक रखा है। संयुक्त परिवार के मुखिया बदीउज्जमा ने भाईयों के बेटों का नाम भी नीरज, अनूप, अनिल व आलोक रखा है।

भागवत पुराण, रामायण व भगवत गीता में विशेष रुचि
पांचों वक्त के नमाजी बजीउज्‍जमा श्रीमद् भागवत पुराण, रामायण व भगवत गीता में विशेष रुचि रखते हैं। कुरान का पाठ करना भी नहीं भूलते हैं। गांव के हिंदू भी समय निकालकर इनके पास हिंदू धर्मग्रंथों का श्रवण करने आते हैं। एकलव्य व जाबालि जैसे वैदिक पात्रों पर कोई इनसे खुली बहस कर सकता है। वह दादू की लेखनी का दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि इस्लाम वही है, जो सबको साथ लेकर चले।बदीउज्‍जमा शायराना अंदाज में बोलते हैं कि ‘चाहते तुम हालात बदल सकते थे, मेरे आंसू तेरी आंखों से निकल सकते थे। तुम तो ठहरे रहे झील के पानी की तरह, दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे’।

मंदिर में झुकाते हैं शीश
अधिवक्ता बदीउज्‍जमा नियमित मंदिर जाकर हनुमान जी का दर्शन तो करते ही हैं, आयोजन और समारोहों में तिलक व चंदन बड़े अदब के साथ स्वीकार करते हैं। कहते हैं कि मन साफ है, तो सब कुछ यहीं है। कर्तव्य को ही धर्म मानने वाले सिद्दीकी धारयति इति धर्म: कहते हुए बताते हैं कि जो धारण किया जाए, वही धर्म है। जिसका अभिप्राय कर्तव्य पालन से ही है। अंग्रेजी कवि हूपर और गोस्वामी तुलसीदास की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए वे कर्तव्य को ही धर्म मानते हैं। रामचरित मानस का उदाहरण देते हुए कहते है- प्रथम भगति संतन कर संगा। यदि संगी साथी अच्छे व सच्चे हैं तो संमार्ग पर ही चलेंगे। कुरान की आयतों पर जितनी दखल मुसलमान के तौर पर यह रखते हैं, इनकी उतनी ही पकड़ गोस्वामी जी के रामचरितमानस पर भी रखते हैं।

कई बार हुआ हंगामा
बदीउज्जमा सिद्दीकी ने जब नियमित रूप से गीता और रामायण का पाठ शुरू किया, तो उनके इस फैसले पर काफी हंगामा खड़ा हुआ था। उनकी बिरादरी के तथाकथित ठेकेदारों ने इसे समाज और धर्मद्रोह तक की संज्ञा दे डाली थी, लेकिन धीरे धीरे लोग उनके व्‍यवहार से प्रभावित हो इन सब को भूलते गए।

नमाज के साथ गीता और रामायाण का करते हैं पाठ
बदीउज्जमा सांप्रदायिकता की दकियानूसी सोच को मात देकर आज पांचों वक्त के नमाजी होने के साथ ही अपने घर बैरागल गांव में गीता और रामायण का पाठ भी करते हैं। गीता के 18 अध्याय और 700 श्लोक कंठस्थ होने के कारण उनकी गिनती हिंदू धर्म के अच्छे विद्वानों में होने लगी है। यहां तक कि वह अपने क्लाइंट्स को भी गीता का उपदेश देने से नहीं चूकते हैं। बदीउज्जमा बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें हिंदू धर्म ग्रंथों में आस्था रही है। इसलिए संस्कृत में पढ़ाई करके साहित्याचार्य की उपाधी भी हासिल की।

हिन्‍दू धार्मिक ग्रंथों से लगाव
बदीउज्जमा के मुताबिक संस्कृत और हिंदू धार्मिक ग्रंथों में लगाव को देखते हुए उनका समाज के लोगों के बीच लगातार विरोध हुआ लेकिन समय-समय पर अपने तर्कों से सबकी जुबान बंद कर दी। 65 साल के बदीउज्जमा बतातें हैं कि गीता, श्रारामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण का पाठ करते हुए पिछले 40 साल बीत गए हैं और चुनौती के साथ कह सकता हूं कि इलाके में कोई पंडित शास्त्रार्थ कर उनका मुकाबला नहीं कर सकता है। अधिवक्ता हनुमान प्रसाद ने दावा करते हुए कहा कि बदीउज्जमा के घर पर हिंदू धर्मग्रंथों की पूरी लाइब्रेरी है। बदीउज्जमा अपने वकील साथियों को भी अकसर गीता और रामायण का उपदेश देकर उनकी समस्याओं का समाधन करते रहते हैं।

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