परवरिश (कहानी)

  “उसके जाने के बाद मैंने यह बगिया बसाई. इन पौधों को रोपकर मैं हर्षित होती हूं, सींचकर परितृप्त होती हूं और इन्हें बढ़ता देखती हूं, तो मन में उल्लास की हिलोरें उठने लगती हैं. मैं सच कहती हूं बेटी, मेरे मन में न इनसे फल पाने की इच्छा है और न ही छाया की चाहत. कभी-कभी सोचती हूं, हम अपने बच्चों को भी इसी तरह बिना किसी अपेक्षा के पालें, तो ज़िंदगी कितनी सुकूनभरी हो जाए. ज़रा सोचो, यदि उस दिन मैं बंटी को रोक लेती, तो वह कुछ…

पचास का नोट (कहानि)

एक  व्यक्ति  office में देर  रात तक काम  करने  के  बाद  थका -हारा घर  पहुंचा  . दरवाजा  खोलते  ही  उसने  देखा  कि  उसका  पांच  वर्षीय  बेटा  सोने  की  बजाये  उसका  इंतज़ार  कर  रहा  है . अन्दर  घुसते  ही  बेटे  ने  पूछा —“ पापा  , क्या  मैं  आपसे  एक  question पूछ  सकता  हूँ ?”  “ हाँ -हाँ  पूछो , क्या  पूछना  है ?” पिता  ने  कहा .बेटा – “ पापा , आप  एक  घंटे  में  कितना  कमा लेते  हैं ?” “ इससे  तुम्हारा  क्या  लेना  देना …तुम  ऐसे  बेकार  के  सवाल  क्यों  कर  रहे  हो ?” पिता  ने  झुंझलाते  हुए  उत्तर  दिया . बेटा – “ मैं  बस  यूँही जानना  चाहता …

शुभकामना (कहानी): सुषमा मुनींद्र

आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था. बगीचे में आकर मनीषा को लगता है उसने ख़ुद को खोज निकाला है और इस संसार में उसका होना, होने की तरह दर्ज हो रहा है. वह क्यारियों को दुरुस्त करती है, लॉन में चहलक़दमी करती है. कभी लॉन के कोने में लगे झूले में…

कब तक? (कहानी) : उषा गुप्ता

“आनंद चाहता, तो आठ साल पहले तुम्हारे द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद एक नई शुरुआत कर सकता था, पर उसने तुम्हारी माफ़ी का लंबा इंतज़ार किया है. साथ ही तुम्हारी मर्ज़ी को देखते हुए उसने अपने बच्चों से भी दूरी रखी. कब तक तुम जान-बूझकर इन नागफनी के कांटों को गले लगाओगी?” ”अब कैसा लग रहा है तुम्हें?” लतिका के पूछने पर कुमुद ने धीरे से सिर हिलाकर जवाब दिया, “अब मैं ठीक हूं, तुम भी अपना घर देखो. मैं संभाल लूंगी ख़ुद को, वैसे भी तीन-चार दिन में…

रोल मॉडल (कहानी) : उषा गुप्ता

“कोई भी इंसान सर्वगुण संपन्न या अपने आपमें पूर्ण नहीं होता. उसमें कुछ-न-कुछ कमियां अवश्य होती हैं, इसलिए किसी एक इंसान को अपना ‘रोल मॉडल’ मानना नासमझी है. इसी तरह हर इंसान में कोई ख़ूबी भी अवश्य होती है. हमें चाहिए कि हम उसकी उस ख़ूबी को अपना रोल मॉडल मानकर आत्मसात करें.” शिखा से फ़ोन पर बात करके हमेशा शुभ्रा का मन हल्का हो जाता है, इकलौती लाड़ली बेटी जो ठहरी. लेकिन आज उसका फ़ोन सुनने के बाद शुभ्रा का मन भारी हो गया था. कल शिखा के कॉलेज…