बेवसी (कविता) : कृष्णा

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कभी तो ज़िन्दगी थी मुस्कराहट
अब तो ज़िन्दगी है फरियाद
अब तो ज़िन्दगी है फरियाद.
किस किस की सामना करें हम ?
किस को अपना कहेंगे हम ?
हर रात को तो दिन रहे – पर
हम को अपना कोन है ?
चिंतावों की आग में
हर एक पल हम जल रहे.
राख की एक ढेर बनकर
रह गयी हर मंज़िलें – हाये
रह गयी हर मंज़िलें.
कब बहार फिर आएगी ?
पतझड की जान लहराएगी ?
सूनी-सूनी रातों में कब
नींद भी मुझे आएगी – कब
नींद मुझको पाएगी ?

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