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शुभकामना (कहानी): सुषमा मुनींद्र

October 29, 2017

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आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था.

बगीचे में आकर मनीषा को लगता है उसने ख़ुद को खोज निकाला है और इस संसार में उसका होना, होने की तरह दर्ज हो रहा है. वह क्यारियों को दुरुस्त करती है, लॉन में चहलक़दमी करती है. कभी लॉन के कोने में लगे झूले में बैठती है. ऊपर स्वच्छ आकाश है और फेंस के पार मकानों की छत पर लोग हैं, मैदान में खेलते बच्चे हैं. बच्चे, मनीषा को निरुत्साह करते हुए अनायास याद दिला देते हैं कि वह संतानहीन है. वह यातना से गुज़रती है. एक शिशु… एक शिशु उसकी ज़िंदगी को फलदायी बना सकता है, पर… एक बच्चे के बिना सब कुछ अस्वाभाविक लगता है. बच्चे कितने हैं जैसा स्वाभाविक प्रश्‍न भी. प्रहार करते इस प्रश्‍न पर उसका चेहरा खिंचकर सख़्त होने लगता है.

“नहीं हैं.”

“नहीं हैं… राम-राम…”

यह दया भाव बताता है कि वह दूसरी स्त्रियों से भिन्न है.

“राम-राम करने जैसी क्या बात है?”

“वकील साहब दिनभर दफ़्तर में रहते हैं, बच्चे नहीं हैं. मैडम, आप घर में अकेली कैसे रह लेती हैं?”

हर वक्ता स्त्री को सख़्ती से देखती है, “उत्पात करते बच्चों को देखती हूं, तो बच्चे न होने का कोई अफ़सोस नहीं होता. मेरे बगीचे से बच्चे कभी अमरूद चुराते हैं, कभी गुलाब.”

किसी दिन मनीषा ने दस-बारह साल के लड़के को फूल चुराते हुए पकड़ा था. लड़के को रोते… मिन्नते करते… माफ़ी मांगते देख उसे क्रूर क़िस्म का सुख मिल रहा था.

मानो बच्चेवाली स्त्रियों से बदला ले रही हो. साथ के लड़के ने शायद पकड़े गए लड़के के घर में सूचित कर दिया था. बदहवास मां आकर खेद प्रगट करने लगी, “मैडम, कोई माता-पिता बच्चे को चोरी-डकैती नहीं सिखाते, पर ये पता नहीं कहां से सीख लेते हैं. हमसे तो बेऔलाद अच्छे…” बेऔलाद! यह शब्द उसके भीतर प्रक्षेपास्त्र की तरह फूटा.

यदि वह सही समय और सही आयु में मां बनती, तो आज उसका बच्चा, इस अमरूद चोर लड़के की उम्र का होता. लेकिन तब उसे बच्चे से अधिक अपने अध्यापन में रुचि थी. उसने भार्गव से स्पष्ट कह दिया था, “अभी बच्चे नहीं होने चाहिए. मैं कॉलेज और बच्चे साथ-साथ मैनेज करने की स्थिति में नहीं हूं.” असावधानीवश गर्भवती हो गई, तो भार्गव के विरोध और चिकित्सक की सलाह पर बिल्कुल ध्यान न दे गर्भपात करा लिया. और तीस की आयु पार कर जब ललक उठी घर में किलकारी गूंजनी चाहिए, तब चिकित्सक की चेतावनी का सत्यापन होता जान पड़ा- पहला गर्भपात अक्सर गर्भधारण को कठिन बना देता है. तमाम जटिलताएं आती हैं. वह गर्भधारण नहीं कर पा रही थी. किया तो मिस कैरिज हो गया. फिर चार वर्ष बाद बच्ची ने गर्भकाल पूर्ण किया, लेकिन गर्भ में ही सड़ चुकी थी. फिर संभावना न बनी. मनीषा निरुपाय हुई और सफल अधिवक्ता भार्गव क़ानून की किताबों में बच्चा गोद लेने के अधिनियम देखने लगे. संबंधित अनुच्छेदों को पढ़ते-समझते भार्गव मनीषा को बहुत दीन लगते. भार्गव पिता बन सकते थे, उसकी ज़िद ने उनसे यह सुख छीन लिया.

“भार्गव, तुम क्या बच्चा गोद लेने का विचार बना रहे हो?”

“विकल्प ही क्या है?”

“मेरी ज़िद बुरी थी, लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि अब किसी स्त्री की गोद सूनी नहीं रहेगी. तमाम विधियां हैं. पैसा लगेगा, लेकिन हमें कोशिश करनी चाहिए.”

“वह सब मुझे कृत्रिम, अप्राकृतिक लगता है. तकलीफ़देह भी. तुम चालीस पूरा कर रही हो. कमज़ोर हो गई हो. तुम्हारा स्वास्थ्य देखना ज़रूरी है.”

“थोड़ा रुको न. भगवान शायद हमारी सुन लें.”

“दरअसल, तुम भावुक हो रही हो. एक दिन मैंने एक पॉलिटिकल मैगज़ीन में कुछ दंपतियों के विचार पढ़े. ख़ासकर स्त्रियां अपने करियर को इतनी प्रमुखता दे रही हैं कि वे सेटल होने के बाद बड़ी उम्र में विवाह करती हैं. बच्चे करियर में बाधक होते हैं, इसलिए गर्भधारण न कर बाद में ज़रूरत मुताबिक़ बच्चा गोद ले लेना चाहती हैं. और ये दंपति ख़ुश हैं कि वे जनसंख्या विस्फोट का कारण नहीं बनेंगे.”

मनीषा ने बहुत निरीह होकर भार्गव को निहारा. क्या यह सायास है कि भार्गव मेरी भूल को इन दंपतियों के माध्यम से मुझे बताना चाहते हैं?

“मैं कितनी परेशान हूं भार्गव.”

“इसीलिए फैसले पर आना चाहता हूं. इन लोगों की मान्यता से मैं प्रेरित हुआ हूं. मनीषा, हमें बच्चा गोद ले लेना चाहिए. बच्चा रिश्तेदारी से आएगा या अनाथ आश्रम से, यह तुम डिसाइड करोगी.”

लेकिन मनीषा की आस नहीं टूटती.

“मैं गर्भवती हुई न? फिर हो सकती हूं. उम्र नहीं बीत गई. ऐसा न हो हम जल्दबाज़ी में बच्चा गोद ले लें, फिर अपना हो जाए, तो दत्तक के साथ ईमानदार न रहें या वह हमारे बच्चों के लिए संकट बने.”

“हां, पर…”

मनीषा कुछ न बोलती.

वह चुप रहने लगी है. बातें नहीं सूझतीं. कॉलेज से आकर घर में ़कैद हो जाती है. धूप ढलने की प्रतीक्षा करती है. ढलते ही बगीचे में आ जाती है. बगीचे में आई, तो देखा आउटर गेट पर एक मोटी स्त्री और छह-सात साल की बच्ची खड़ी है. मनीषा ने आते-जाते इस बच्ची को सड़क पर खेलते देखा है.

“कहिए?” मनीषा गेट पर आई.

“वह घर देखती हो, जहां छत पर कपड़े फैले हैं, हम वहां रहते हैं. यह नीली है, मैं इसकी दादी. गांव के बड़े घर में रहती हूं, तो मुझसे यहां दो कमरे में नहीं रहा जाता. जी घबरा रहा था, सो नीली को लेकर निकल पड़ी कि देखूं यह इतना सुंदर बगीचा किसका है.” वृद्धा इस तरह परिसंवाद करने लगी मानो पूर्व परिचित है. जबकि मनीषा किसी से परिचय नहीं बढ़ाती. लोग प्रश्‍न बहुत पूछते हैं.

“अंदर आ जाऊं?” मनीषा चुप थी, लेकिन

दादी-पोती गेट खोल दाख़िल हो गईं.

“इतने सारे फूल? झूला भी है? नीली झूलेगी?”

दादी ने कहा तो नीली झिझक गई.

मनीषा ने देखा गोल भरे चेहरेवाली मासूम बच्ची उसे उत्सुकता से ताक रही है.

दादी कहती रही, “नीली की मां बताती है तुम कॉलेज में पढ़ाती हो.”

“हां.”

“बताओ, इतना बड़ा घर-द्वार, बाग-बगीचा. भगवान बाल-बच्चा दे देता, तो बगीचा चमन हो जाता.”

वृद्धा ने अपनी समझ से मनीषा को सांत्वना देने जैसी बात की, लेकिन मनीषा के द्वैत और द्वंद्व ख़त्म नहीं होते.

“मैं आराम से हूं.”

वृद्धा को अब भी बुद्धि न आई.

“नीली संझाबेरी तुम्हारे पास आ जाया करेगी. तुम्हारा मन बहलेगा.”

मनीषा का दिलो-दिमाग़ झनझना गया. नीली उसके मन बहलाव का साधन बने उसे स्वीकार नहीं. सदाशयता, सहानुभूति, सहयोग नहीं चाहिए.

लेकिन नीली नहीं समझती थी यहां आकर वह मनीषा को नाराज़ करने जैसी कोशिश करेगी. झूला उसके लिए आकर्षण था और वह शाम को आने लगी.

“स्कूल से लौटकर यूनीफॉर्म बदली और आपके पास भाग आई. मां बोली कुछ खा लो, मैंने कहा पहले आंटी के पास हो आऊं.”

नीली ने कहा उत्साह से, पर देखा मनीषा उसकी बात सुनकर प्रसन्न नहीं है, बल्कि उसे अप्रिय भाव से देख रही है. इस घर में बच्चे होते, तो उनके बहाने यहां आना आसान हो जाता. नीली अपने स्तर पर मानो उपाय करने लगी.

“आंटी, आपके घर में बच्चे नहीं हैं?”

मनीषा का चेहरा सख़्त हो गया, तो यह भी

मुझे कठघरे में खीचेंगी? घर में सुनती होगी मैं नि:संतान हूं, लेकिन लोग चिंतित क्यों हैं? कठोर था स्वर, “यहां बच्चे नहीं हैं. मत आया करो.”

“मैं आपके पास आती हूं.”

मनीषा नहीं समझ पा रही है कि नीली के साथ किस तरह प्रस्तुत हो. नीली के प्रति निर्लिप्त रहती है, लेकिन कठोर होकर उसे आने से रोक नहीं पाती है. अनायास होता है, हम जिन नामालूम-सी बातों को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित नहीं करना चाहते, वे सम्मिलित हो जाती हैं. नीली को देखकर मनीषा अनायास ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगती है कि ऐसी ही सलोनी बच्ची मुझे चाहिए, लेकिन नीली की उपस्थिति त्रास भी देती है. यहां तक कि जब नीली ने आकर बताया उसका जन्मदिन आनेवाला है, तब भी मनीषा ने उत्साह से नहीं पूछा, कब?

नीली उसकी स्थिति-मनःस्थिति नहीं समझती. ख़ुद ही बता दिया.

“14 अक्टूबर. बस, एक हफ़्ता है. आंटी, आपका जन्मदिन कब है?”

“20 फरवरी.”

“मैं नोट बुक में नोट कर लूंगी. मैंने मां, पापा, भाई, फ्रेंड्स सबके बर्थडे नोट कर रखे हैं. सबको विश करती हूं.”

14 अक्टूबर की शाम नीली ऐसे आह्लाद और विश्‍वास के साथ आई मानो मनीषा को यह तारीख़ याद होगी. मनीषा को याद नहीं. नीली झूला न झूलकर उसके आस-पास मंडराने लगी, “आज मैंने क्लास में चॉकलेट बांटें.”

“क्यों?”

“भूल गईं? मेरा बर्थडे?”

अदा मासूम थी. मनीषा को कहना पड़ा.

“जन्मदिन शुभ हो नीली!”

साथ ही मनीषा ने पीला गुलाब तोड़ा और नीली को दिया.

नीली उन फूलों को बहुत ललचाकर देखती रही. वह गुलाब उसकी उपलब्धि थी.

“ब्यूटीफुल. मैं इस गुलाब को अपने भाई को दिखाऊंगी.”

यह पहली बार था जब मनीषा नीली के प्रति सजग हुई. बच्चे वस्तुत: मासूम, निश्छल और चंचल होते हैं. अपनी उपस्थिति से वातावरण को सहज बना देते हैं.
मान-अभिमान से मुक्त. तभी तो नीली ने स्मरण कराया उसका जन्मदिन है. कितनी क्रिया-प्रतिक्रिया. ईश्‍वर ऐसा ही बच्चा मेरा हो. अपने क्रियाकलापों से मुझे विभोर कर दे.

मेरा बच्चा.

और प्रार्थना के स्वर बिखर गए. नीली भ्रम है. स़िर्फ एक भ्रम. यह सुख और संतुष्टि नहीं दे सकती. मुझे इससे सुख नहीं चाहिए. एक क्षण ऐसा आया, जब लगा मनीषा ज़ोर से चीखेगी- ‘नीली तुम मेरी भावनाओं को उकसाने के लिए क्यों चली आती हो? तुम मुझे यातना देती हो. कल से मत आना.’

पर नीली कैसे समझेगी न आने देने का यह कैसा कारण है? वह तो मनीषा के भाव-अभिप्राय से निर्लिप्त रहकर उस पर विश्‍वास करने लगी है. शाम को एक फॉर्म लेकर आई, “आंटी, आज के अख़बार के साथ यह फॉर्म मिला है. आदित्य कंप्यूटर सेंटर का है. इसमें दिए टेन क्वेश्‍चन, जो बच्चा सॉल्व कर लेगा, उसे फ्री में कंप्यूटर सिखाया जाएगा. पापा स़िर्फ दो अन्सर बता पाए. आपसे सब बन जाएंगे. फिर मैं फ्री में कंप्यूटर सीख लूंगी. है न अच्छी बात?”

नीली ने पर्चा और पेन मनीषा को थमा दिया.

मनीषा कुल तीन प्रश्‍न हल कर पाई.

“बस तीन? आप भी पापा की तरह बुद्धू हैं. मैं कंप्यूटर नहीं सीख पाऊंगी.”

“मत सीख. मुझे बुद्धू कहती है. मैनर्स नहीं जानती.”

मनीषा ने कटु होकर पर्चा नीली की ओर फेंक दिया.

“सॉरी आंटी.” नीली पर्चा उठाकर चली गई.

पखवाड़ा गुज़रा. नीली नहीं आई. मनीषा चाहती है कि नीली न आए, लेकिन लग रहा है नीली जब तक रहती है, समय अच्छा गुज़रता है. क्या नीली के एहसास की आदत होती जा रही है? इससे लगाव विकसित करना ख़ुद को धोखा देना है. अब न आए तो ठीक. बेकार की घुसपैठ. नीली अठारहवें दिन आई. मनीषा को झूले पर बैठे देख इस तरह करतल ध्वनि में बोली मानो किसी बड़े को झूले पर बैठे देखना रोमांचक घटना हो, “आंटी, मैं आपको झुलाऊं?”

जवाब में मनीषा ने प्रश्‍न किया, “इतने दिन कहां थी?”

नीली उत्साहित हो गई, “हाफ ईयरली एग्ज़ाम थे. पापा बोले पढ़ो. आप मेरा इंतज़ार करती थीं?”

“हां… नहीं…”

यह नहीं है, तो लगता है इसे आना चाहिए, पर न आए तो अच्छा है. यह बच्ची विभ्रम है, छलावा. इससे भावनाएं जोड़कर कुछ हासिल नहीं होना है.
मनीषा नीली को टालने लगी. मैं नोट्स बना रही हूं, डिस्टर्ब मत करो… मेरी तबीयत ठीक नहीं है… बाहर जा रही हूं… सालाना इम्तिहान नज़दीक है, तुम पढ़ती क्यों नहीं?… नीली आती और उदास होकर लौट जाती. फिर उसने आना छोड़ दिया. दूर बच्चों के साथ खेलती दिख जाती.

दिनों बाद अचानक चली आई.

“तुम?” मनीषा के स्वर में अचरज था या आरोप वह स्वयं नहीं जानती.

“अभी चली जाऊंगी.” नीली तेज़ चाल से उसकी ओर बढ़ी आ रही थी.

धृष्ट लड़की रुक नहीं रही है. गंवार बच्चों को मुंह लगाओ, तो लिहाज़ भूल जाते हैं.

लिहाज़ भूल नीली ने स़फेद गुलाब तोड़ लिया.

“नीली, बेव़कूफ़…”

जब तक मनीषा नीली की ओर झपटती, नीली ने जींस की जेब से छोटा ग्रीटिंग कार्ड निकालकर उसके ऊपर गुलाब को रख लिया, “हैप्पी बर्थडे आंटी. मैंने कहा था न मैं आपका बर्थडे याद रखूंगी. मैं बड़ा कार्ड लेना चाहती थी. मां ने कहा महंगा है, छोटा लो. और मैं फूल भी अपने घर से लाती, पर मेरे घर में गेंदा है, गुलाब नहीं. लीजिए.”

दो छोटे हाथ मनीषा को बहुत कुछ सौंप रहे थे- छोटी-सी उम्मीद… नन्हा-सा विश्‍वास… एक कोमल सपना… ओह! यह मासूम मुद्रा. यह भोला भाव. मनीषा को नीली का जन्मदिन याद नहीं था और नीली ने याद दिलाया था. आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था. वह पिघलकर एकदम नरम पड़ गई. इच्छा हुई नीली के हाथों को थाम ले. उसके स्पर्श को अपने भीतर जज़्ब होने दे. उसके वजूद को महसूस करे.

“नीली, तुम आई, मुझे अच्छा लगा.” मनीषा ने कार्ड व फूल लेते हुए नीली के हाथ थाम लिए.

मासूम मुलायम छुअन. यह स्पर्श कैसा अलौकिक है अब तक नहीं जाना. बच्चों को कभी अपने पास नहीं आने दिया. बच्चों का आस-पास होना तनाव और दबाव को किस तरह दूर कर देता है, कभी जानना नहीं चाहा और घुटती रही अपने बनाए अंधेरों में.

“मैं जाऊंगी.” नीली ने असहजता में हाथ छुड़ा लिए.

“रुको ना. कुछ खिलाती हूं.”

“नहीं. मां ने कहा है तुरंत वापस आना. मां काम करती है, तब मुझे भाई को संभालना पड़ता है. वह छोटा है न.”

मनीषा की इच्छा हुई कहे- ‘नीली रुको. मैं फुर्सत में हूं. मुझे नोट्स नहीं बनाने, कहीं नहीं जाना, तबीयत बिल्कुल ठीक है. रुको. रोज़ आया करो.’ नहीं कह सकी. नीली समझ लेगी बहाने से उसे भगाया जाता था.

मनीषा जाती हुई नीली को देखती रही. उसकी शुभकामना ने मनीषा को सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया. भार्गव कचहरी से लौटे, तो कहेगी हमें अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लेना चाहिए.


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