मां-बाप ने नहीं दिया था खून, बहन के DNA से हुआ दाऊद के गुर्गे झिंगाड़ा का खेल खत्म

dawd

मुंबई : अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के शूटर मुजक्किर मुदस्सर हुसैन उर्फ मुन्ना झिंगाड़ा के मुंबई प्रत्यर्पण का मुकदमा बैंकॉक कोर्ट में भारत जीत गया है। मुंबई पुलिस के एक अधिकारी के अनुसार, कानूनी लड़ाई में अपनी सगी बहन का डीएनए मुन्ना को भारी पड़ गया। हालांकि, मुन्ना ने पाकिस्तान सरकार के जरिए अपने बचाव में अपने दो बच्चों के कराची के स्कूल से जुड़े दस्तावेज बैंकॉक की अदालत में दिए थे, ताकि वह साबित कर सके कि वह पाकिस्तानी है लेकिन कोर्ट ने मुन्ना के इन फर्जी सबूतों को कोई महत्व नहीं दिया।

क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार, कई साल पहले बैंकॉक की अदालत में जब मुन्ना झिंगाड़ा के प्रत्यर्पण का केस शुरू हुआ, तो हमने उसके मां-बाप का डीएनए लेना चाहा लेकिन दोनों ने यह देने से मना कर दिया। ऐसे में उसकी बहन को आश्वस्त कर उसके ब्लड सैंपल्स लेकर बैंकॉक पुलिस और वहां की अदालत को दे दिए गए। बैंकॉक में मुन्ना के डीएनए से बहन का डीएनए मिल गया।

नहीं काम आया फर्जी पाकिस्तानी पासपोर्ट 
मुन्ना झिंगाड़ा का केस वहां पर ही कमजोर हो गया। फिर भी मुन्ना ने अपने बचाव में ‘मोहम्मद सलीम’ के नाम से बना फर्जी पाकिस्तानी पासपोर्ट पेश किया। साथ ही कराची के एक स्कूल के कुछ सर्टिफिकेट्स सौंपे, जहां उसके दो बच्चे पढ़ते हैं। उसने अपने दोनों बच्चों के बर्थ सर्टिफिकेट्स बैंकॉक की कोर्ट को फिर भी नहीं दिए। इसकी वजह यह थी कि उसके एक बच्चे का जन्म पाकिस्तान में हुआ था, जबकि दूसरे का मुंबई में हुआ था।

जिस बच्चे का जन्म मुंबई में हुआ था, उसका बर्थ सर्टिफिकेट मुंबई पुलिस के पास था। मुन्ना को डर था कि एक बच्चे के दो अलग-अलग देशों के बर्थ सर्टिफिकेट्स से उसकी पोल खुल जाएगी। इसीलिए उसने बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र दिए ही नहीं। इस वजह से भी उसका केस बैंकॉक की कोर्ट में कमजोर हो गया था। मुन्ना ने मुंबई में पढ़ाई की है। उसके स्कूल के दस्तावेज भी मुंबई पुलिस ने बैंकॉक की अदालत में पेश कर दिए। यह सबूत भी मुन्ना को भारी पड़ गए।

जब पुलिस के फूले हाथ-पांव 
इस केस में पिछले साल मुंबई पुलिस के तब हाथ-पांव फूल गए, जब एकाएक मुन्ना झिंगाड़ा के मां-बाप मुंबई से गायब हो गए। पुलिस डर गई कि कहीं वे पाकिस्तान तो भाग नहीं गए। बाद में उन्हें बहराइच से ट्रेस किया गया, जहां से नेपाल सीमा बहुत ज्यादा दूर नहीं। एक अधिकारी ने बताया कि मां-बाप ने पूछताछ में बताया कि वे डर गए थे कि मुकदमे के दौरान मुंबई पुलिस उन्हें कहीं बैंकॉक की कोर्ट में पेश न कर दे और वहां उनका ब्लड लेकर मुन्ना के खून से उसका मिलान न कर दे। वे लोग अपने बेटे के खिलाफ किसी भी तरह का सबूत या गवाह नहीं बनना चाहते थे।

वैसे उसके पिता बहराइज के ही रहने वाले हैं। वह वहां प्लंबर थे। खुद मुन्ना भी अपराध की दुनिया में आने से पहले प्लंबर का ही काम करता था। पिछले डेढ़ दशक में तीन डीसीपी- धनंजय कुलकर्णी, मोहन दहिकर और दिलीप सावंत बैंकॉक की कोर्ट में गए। मुन्ना के खिलाफ इंस्पेक्टर शालिनी शर्मा, शंकर इंदलकर, अजय सावंत, विनय घोरपडे और सुधीर दल्वी ने भी उसके फिंगर प्रिंट्स सहित हर कागजात जमा किए, जिससे बैंकॉक कोर्ट में उसके भारतीय होने के सबूत दिए जा सकें। इन सबके प्रयासों से पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी और भारत के पक्ष में फैसला गया।

प्रत्यर्पण में लग सकता है वक्त 
बैंकॉक की कोर्ट ने मुन्ना झिंगाड़ा को इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने का एक महीने का वक्त दिया है। मुंबई पुलिस का मानना है कि ऊपरी कोर्ट में कानूनी लड़ाई पूरी होने में कम से कम तीन महीने या उससे ज्यादा का समय लगेगा।

आधा दर्जन से ज्यादा मामले 
मुन्ना झिंगाड़ा मूल रूप से जोगेश्वरी का रहने वाला है। उसके खिलाफ 1992 में जोगेश्वरी पुलिस स्टेशन में पहला और 1997 में अंधेरी पुलिस स्टेशन में आखिरी एफआईआर दर्ज हुई थी। उसके खिलाफ मुंबई में जुहू, सांताक्रूज,माहिम, डोंगरी और आग्रीपाडा में भी केस दर्ज हैं। वह सितंबर, 2000 में बैंकॉक में छोटा राजन पर की गई गोलीबारी की वजह से सबसे ज्यादा सुर्खियों में आया। इस शूटआउट में राजन घायल हो गया था, जबकि राजन का साथी रोहित वर्मा मारा गया था।

Print Friendly, PDF & Email

Leave a Comment