ज्यादा ग्लूटेन वाले डायट से डायबीटीज का खतरा

gluten

गर्भवती महिलाओं द्वारा अधिक ग्लूटेन युक्त आहार लेने से होने वाले बच्चे में टाइप 1 डायबीटीज का खतरा बढ़ जाता है। ग्लूटेन एक प्रकार का प्रोटीन है जो गेहूं, बार्ली और राई जैसे अनाज से बने भोजन में मिलता है। सिलिएक डिजीज से प्रभावित लोगों में जो कि टाइप1 डायबीटीज जैसी एक ऑटोइम्यून बीमारी है, में व्यक्ति को ग्लूटेन वाला आहार हजम नहीं होता।

होने वाले बच्चे में टाइप 1 डायबीटीज का खतरा
डेनमार्क और फिनलैंड में हुए एक नए अध्ययन जो ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है, में पाया गया है कि गर्भावस्था में जो महिलाएं अधिक ग्लूटेन का इस्तेमाल करती हैं उनके बच्चों में टाइप 1 डायबीटीज होने का खतरा अधिक रहता है। इसका मतलब यह है कि जो माएं पास्ता, ब्रेड, पेस्ट्रीज और सीरियल अधिक खाती हैं उनके बच्चों में ऐसी स्थिति विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। जो महिलाएं कम ग्लूटेन का इस्तेमाल करती हैं यानी 7 ग्राम/प्रति दिन से कम उनकी तुलना में वे महिलाएं जो 20 ग्राम/प्रतिदिन से अधिक ग्लूटेन इस्तेमाल करती हैं उनमें फॉलोअप के दौरान टाइप 1 डायबीटीज होने का खतरा बढ़ जाता है।

ग्लूटेन से होने वाली समस्या की हिस्सेदारी तब भी दिखाई देती है जब अन्य सम्भावित कारकों जैसे माँ की उम्र, वजन (बीएमआई), टोटल एनर्जी इनटेक और गर्भावस्था में धूम्रपान आदि को ध्यान में रखते हैं तब भी खतरा काफी अधिक रहता है।

टाइप 1 डायबीटीज का खतरा टाइप 2 से अधिक
टाइप 1 डायबीटीज से पीडित लोगों में इंसुलिन का उत्पादन नहीं होता है, जबकि टाइप 2 डायबीटीज से पीडित लोगों में पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनता यानी उनका शरीर इसके खिलाफ रेजिस्टेंस उत्पन्न कर लेता है। ऐसे में रक्त में बहुत अधिक मात्रा में ग्लूकोज जमा हो जाता है। उन लोगों में टाइप 2 डायबीटीज होने का खतरा अधिक रहता है जिनका वजन सामान्य से अधिक होता है, जिनका पारिवारिक इतिहास हो, उम्र या एथनिक बैकग्राउंड आदि खतरे को बढ़ाते हैं। टाइप 1 डायबीटीज आमतौर पर बचपन में शुरू होती है, इसकी शुरुआत अचानक होती है और बहुत ही कम समय में यह बेहद गम्भीर रूप ले लेती है। टाइप 2 डायबीटीज आमतौर पर उम्र बढने के साथ होती है और कई बार सालों तक पीड़ित को इसकी जानकारी भी नहीं होती।

टाइप 2 का इलाज हेल्दी डायट और एक्सर्साइज से
टाइप 1 डायबीटीज का इलाज इंसुलिन की डोज से किया जाता है। इसे या तो इंजेक्शन के जरिए मरीज को दिया जाता है या पम्प के जरिए। शुरुआत में, टाइप 2 का इलाज स्वस्थ्य आहार और व्यायाम से किया जाता है। बाद में, टैबलेट और इंसुलिन की भी जरूरत पड़ती है। ग्लूटेन के इस्तेमाल और टाइप 1 डायबीटीज के बीच सम्बंध आंत में इंफ्लेमेशन या पर्मिएबिलिटी (लीकीनेस) के कारण होता है। ग्लूटेन में एमीनो ऐसिड प्रोलाइन और

ग्लूटामाइन
अधिक होता है जो कि आंत में आंशिक रूप से घुलनशील होता है और इसे अधिक इम्युनोजेनिक बनाता है। यह स्थिति आइसलेट-ऑटोइम्यूनिटी की शुरुआत करती है और जीवन को खतरे में डाल देती है।

आहार में बदलाव करें लेकिन ग्लूटे को बंद न करें
ऐसे में यह सलाह दी जाती है कि महिलाओं को इन साक्ष्यों को आधार बनाकर अपने आहार में बदलाव लाना चाहिए। हालांकि संतुलित आहार लेना बेहद जरूरी है, मगर यह भी नहीं कहा जा सकता है कि गर्भावस्था में अपने आहार से ग्लूटेन को पूरी तरह से बाहर कर देना चाहिए।

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